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महात्मा गांधी ने 12 मार्च 1930 को साबरमती आश्रम से अपने अनुयायियों के साथ दांडी मार्च शुरू किया था, जो सविनय अवज्ञा आंदोलन की आधिकारिक शुरुआत थी।
6 अप्रैल 1930
तर्क: गांधी जी और उनके समर्थक 24 दिनों की यात्रा के बाद 5 अप्रैल को दांडी पहुंचे और अगले दिन यानी 6 अप्रैल 1930 को सुबह नमक बनाकर ब्रिटिश कानून का उल्लंघन किया।
लॉर्ड इरविन
तर्क: आंदोलन के दौरान भारत के वायसराय लॉर्ड इरविन थे। बाद में आंदोलन को रोकने के लिए गांधी जी और उनके बीच 'गांधी-इरविन समझौता' हुआ था।
खान अब्दुल गफ्फार खान
तर्क: खान अब्दुल गफ्फार खान (जिन्हें 'सीमान्त गांधी' या 'फ्रंटियर गांधी' भी कहा जाता है) ने 'खुदाई खिदमतगार' (लाल कुर्ती आंदोलन) संगठन के माध्यम से आंदोलन का नेतृत्व किया था।
गांधी-इरविन समझौता
तर्क: 5 मार्च 1931 को हुए गांधी-इरविन समझौते के तहत कांग्रेस सविनय अवज्ञा आंदोलन को स्थगित करने और द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए सहमत हुई थी।
सी. राजगोपालाचारी
तर्क: दक्षिण भारत में राजाजी (सी. राजगोपालाचारी) ने तमिलनाडु के तंजौर तट पर नमक कानून तोड़ने के लिए वेदारण्यम नमक सत्याग्रह का नेतृत्व किया था।
सरोजिनी नायडू
तर्क: गांधी जी की गिरफ्तारी के बाद प्रसिद्ध कवयित्री सरोजिनी नायडू, इमाम साहेब और गांधी जी के मणिलाल ने धरासना में नमक डिपो पर अहिंसक विरोध का नेतृत्व किया था, जिस पर ब्रिटिश पुलिस ने बर्बर लाठीचार्ज किया था।
महिलाओं ने बड़ी संख्या में नमक कानून तोड़ने, विदेशी कपड़ों और शराब की दुकानों पर धरना देने में भाग लिया।
तर्क: सविनय अवज्ञा आंदोलन भारतीय इतिहास का पहला ऐसा बड़ा आंदोलन था जिसमें महिलाओं ने अपने घरों से बाहर निकलकर बहुत बड़े पैमाने पर सत्याग्रह और धरने प्रदर्शनों में सक्रिय भूमिका निभाई।
द्वितीय गोलमेज सम्मेलन
तर्क: गांधी-इरविन समझौते के तहत महात्मा गांधी 1931 में लंदन में आयोजित द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने गए थे, हालांकि यह सम्मेलन भारत की स्वतंत्रता की मांगों को लेकर असफल रहा था।
1934
तर्क: द्वितीय गोलमेज सम्मेलन की विफलता के बाद गांधी जी ने 1932 में आंदोलन दोबारा शुरू किया था, लेकिन धीरे-धीरे इसकी गति धीमी हो गई और मई 1934 में कांग्रेस ने इसे आधिकारिक तौर पर पूरी तरह वापस ले लिया।
के. केलप्पन
तर्क: केरल में 'वायकोम सत्याग्रह' के प्रसिद्ध नेता के. केलप्पन (जिन्हें 'केरल गांधी' भी कहा जाता है) ने कालीकट से पय्यानूर तक नमक यात्रा का नेतृत्व किया था।
रानी गाइदिनल्यू
तर्क: नागा आध्यात्मिक और राजनीतिक नेता गाइदिनल्यू ने उत्तर-पूर्व में ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह का नेतृत्व किया था। उन्हें गिरफ्तार कर आजीवन कारावास की सजा दी गई, और जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें 'रानी' कहकर संबोधित किया था।
चौकीदारी कर (Chaukidari Tax)
तर्क: चूंकि बिहार एक लैंडलॉक्ड (भूमि से घिरा) राज्य है और वहां समुद्र तट नहीं था, इसलिए वहां के लोगों ने नमक कानून के विकल्प के तौर पर ब्रिटिश सरकार को 'चौकीदारी टैक्स' देने से साफ मना कर दिया था।
11 सूत्रीय
तर्क: गांधी जी ने यंग इंडिया पत्रिका के माध्यम से लॉर्ड इरविन के सामने 11 मांगें रखी थीं, जिसमें नमक कर को खत्म करना और सैन्य खर्च आधा करना शामिल था। अल्टीमेटम पूरा न होने पर आंदोलन शुरू किया गया।
वेब मिलर
तर्क: अमेरिकी पत्रकार 'वेब मिलर' धरासना में मौजूद थे। उन्होंने लिखा था कि अपने पूरे पत्रकारिता जीवन में उन्होंने ऐसा दर्दनाक और भयानक दृश्य कभी नहीं देखा था, जिसने ब्रिटिश शासन के क्रूर चेहरे को उजागर किया।
चंद्र सिंह गढ़वाली
तर्क: 23 अप्रैल 1930 को पेशावर में खान अब्दुल गफ्फार खान के समर्थकों पर ब्रिटिश सरकार ने गोली चलाने का आदेश दिया था, लेकिन 'चंद्र सिंह गढ़वाली' के नेतृत्व में गढ़वाली रेजिमेंट के भारतीय सैनिकों ने देशभक्ति दिखाते हुए गोली चलाने से इनकार कर दिया।
विदेशी कपड़ों की होली जलाना और राष्ट्रवादी संदेश व पर्चे बांटना
तर्क: आंदोलन में बच्चों ने 'वानर सेना' और लड़कियों ने 'मंजरी सेना' का गठन किया था, जो धरने प्रदर्शनों में बड़ों की मदद करती थीं, तिरंगा फहराती थीं और पुलिस की नजरों से बचकर राष्ट्रवादी पर्चे बांटती थीं।
ब्रिटिश सामानों और वस्त्रों का पूर्ण बहिष्कार तथा स्वदेशी को बढ़ावा देना
तर्क: इस आंदोलन का मुख्य आर्थिक हथियार ब्रिटिश कपड़ों, शराब और अन्य विदेशी सामानों का पूरी तरह बहिष्कार करना था, जिससे ब्रिटिश व्यापार को भारी नुकसान पहुंचा और भारतीय हथकरघा उद्योग को मजबूती मिली।
साइमन कमीशन
तर्क: 1928 में जब साइमन कमीशन भारत आया, तो उसमें एक भी भारतीय सदस्य नहीं था। इसके व्यापक विरोध और लाला लाजपत राय की मृत्यु ने देश में राष्ट्रवाद की एक नई लहर पैदा की, जिसने आगे चलकर सविनय अवज्ञा आंदोलन की जमीन तैयार की
क्योंकि नमक अमीर और गरीब, हर भारतीय के भोजन का एक अनिवार्य हिस्सा था।
तर्क: गांधी जी जानते थे कि नमक एक ऐसी वस्तु है जो समाज के हर वर्ग और हर धर्म के व्यक्ति को सीधे जोड़ती है। इस पर टैक्स लगाना ब्रिटिश सरकार के सबसे दमनकारी चेहरों में से एक था, इसलिए इसे आंदोलन का मुख्य प्रतीक बनाया गया।
कर-नहीं और लगान-नहीं (No-Tax and No-Rent) आंदोलन
तर्क: संयुक्त प्रांत में कृषि संकट के कारण जमींदारों से लगान न देने और सरकार को कर (टैक्स) न देने का आंदोलन चलाया गया था। इसमें जवाहरलाल नेहरू ने सक्रिय भूमिका निभाई थी।
सेंट्रल प्रोविंस (मध्य प्रांत) और महाराष्ट्र
तर्क: महाराष्ट्र, मध्य प्रांत और कर्नाटक के आदिवासी क्षेत्रों में ब्रिटिश सरकार के कड़े वन कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन किया गया, जहां लोगों ने सरकारी जंगलों में मवेशी चराने और लकड़ी काटने पर लगी रोक का उल्लंघन किया।
78
तर्क: गांधी जी ने अपने 78 चुने हुए स्वयंसेवकों के साथ यात्रा शुरू की थी। हालांकि, रास्ते में हजारों लोग इस यात्रा से जुड़ते चले गए और दांडी पहुंचने तक यह एक विशाल जनसैलाब बन चुका था।
घनश्याम दास बिड़ला (G.D. Birla)
तर्क: भारतीय व्यापारियों और उद्योगपतियों ने ब्रिटिश आर्थिक नीतियों के विरोध में इस आंदोलन का पुरजोर समर्थन किया था। जी.डी. बिड़ला और पुरुषोत्तम दास ठाकुरदास जैसे बड़े उद्योगपतियों ने आंदोलन को आर्थिक मदद दी थी।
कनिंघम सर्कुलर (Cunningham Circular)
तर्क: असम में कनिंघम सर्कुलर के तहत छात्रों और उनके अभिभावकों से अच्छे व्यवहार का प्रमाण पत्र मांगा गया था और आंदोलन में भाग लेने पर पाबंदी लगाई गई थी। छात्रों ने इसका बहिष्कार कर शक्तिशाली आंदोलन खड़ा किया।
सभी राजनीतिक कैदियों को रिहा करना, जिन पर हिंसा का आरोप नहीं था
तर्क: ब्रिटिश सरकार केवल उन राजनीतिक कैदियों को रिहा करने पर सहमत हुई जिन पर हिंसा या हत्या का मुकदमा नहीं था। इसी कारण भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फांसी को नहीं रोका जा सका, जो इस समझौते की सबसे बड़ी आलोचना का कारण बना।
सुभाष चंद्र बोस
तर्क: नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने गांधी जी के इस ऐतिहासिक मार्च की भव्यता और प्रभाव को देखकर इसकी तुलना नेपोलियन की एल्बा से लौटने के बाद पेरिस की ओर की गई प्रसिद्ध यात्रा से की थी।
सोलापुर (महाराष्ट्र)
तर्क: गांधी जी की गिरफ्तारी की खबर सुनते ही सोलापुर के कपड़ा मिल मजदूरों और आम जनता ने हिंसक विरोध किया। उन्होंने अदालतों, नगर पालिकाओं और रेलवे स्टेशनों पर कब्जा कर लिया, जिसके बाद वहां मार्शल लॉ लगाना पड़ा था।
असहयोग आंदोलन का उद्देश्य सरकार का साथ न देना था, जबकि सविनय अवज्ञा आंदोलन का उद्देश्य शांतिपूर्ण तरीके से दमनकारी कानूनों को तोड़ना भी था।
तर्क: असहयोग (1920-22) में केवल सरकारी सहयोग बंद करने की बात थी, लेकिन सविनय अवज्ञा (1930) में एक कदम आगे बढ़कर नमक कानून, वन कानून और टैक्स न देकर सीधे तौर पर औपनिवेशिक कानूनों की अवज्ञा की गई।
हरिभाऊ उपाध्याय
तर्क: राजस्थान में अजमेर-मेरवाड़ा क्षेत्र सविनय अवज्ञा आंदोलन का प्रमुख केंद्र था। यहाँ हरिभाऊ उपाध्याय के नेतृत्व में 'नमक सत्याग्रह' चलाया गया और उन्होंने दांडी मार्च की तर्ज पर स्थानीय स्तर पर आंदोलन को संगठित किया था।
महात्मा गांधी
तर्क: आंदोलन के दौरान कांग्रेस ने गिरफ्तारी की स्थिति में नेतृत्व की निरंतरता बनाए रखने के लिए 'डिक्टेटर्स' की एक श्रृंखला नियुक्त की थी, जिसमें पहले डिक्टेटर स्वयं महात्मा गांधी थे। उनकी गिरफ्तारी के बाद अब्बास तैयबजी को अगला डिक्टेटर बनाया गया था
गोपबंधु चौधरी
तर्क: उड़ीसा में कटक, पुरी और बालेश्वर के तटीय जिलों में नमक कानून तोड़ा गया था। यहाँ आंदोलन का मुख्य नेतृत्व उत्कल प्रादेशिक कांग्रेस कमेटी के नेता गोपबंधु चौधरी और आचार्य हरिहर दास ने किया था।
यंग इंडिया (Young India)
तर्क: गांधी जी ने 'यंग इंडिया' पत्रिका में लेख लिखकर लॉर्ड इरविन के सामने अपनी 11 सूत्रीय मांगें प्रस्तुत की थीं और स्पष्ट किया था कि मांगें न मानने पर सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया जाएगा।
लंदन
तर्क: प्रथम गोलमेज सम्मेलन नवंबर 1930 से जनवरी 1931 के बीच लंदन के सेंट जेम्स पैलेस में आयोजित किया गया था। कांग्रेस ने सविनय अवज्ञा आंदोलन में व्यस्त होने के कारण इसका पूरी तरह बहिष्कार किया था।
शोलापुर
तर्क: महाराष्ट्र के सोलापुर में आंदोलन बेहद उग्र था। कपड़ा मिल मजदूरों के प्रदर्शनों पर जब ब्रिटिश सरकार ने बर्बरता की, तो पुलिस बल में शामिल कई भारतीय सिपाहियों ने इसका विरोध करते हुए इस्तीफे दे दिए और जनता का साथ दिया।
सांप्रदायिक पंचाट (Communal Award)
तर्क: अगस्त 1932 में ब्रिटिश सरकार ने 'कम्यूनल अवार्ड' के तहत दलितों के लिए अलग निर्वाचन मंडल (Separate Electorate) की घोषणा की, जिसे गांधी जी ने भारत को बांटने की चाल माना। इसके विरोध में उन्होंने जेल में अनशन किया, जिसका समाधान 'पूना पैक्ट' के रूप में हुआ।