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फेफड़ों के अंदर छोटी-छोटी थैली जैसी संरचनाएं होती हैं जिन्हें कूपिकाएं या वायु कोष्ठक कहते हैं। यहीं पर रक्त और हवा के बीच ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड का आदान-प्रदान होता है।
डायाफ्राम छाती की गुहा के नीचे स्थित एक गुंबद के आकार की मांसपेशी है। इसके सिकुड़ने और फैलने से फेफड़ों में हवा का दबाव बदलता है, जिससे सांस अंदर और बाहर जाती है।
एपिग्लोटिस एक कार्टिलेज (उपास्थि) से बना फ्लैप या ढक्कन होता है, जो खाना खाते समय श्वासनली के द्वार को बंद कर देता है ताकि भोजन फेफड़ों में न जाए।
लैरिंक्स (Larynx) को स्वरयंत्र या वॉइस बॉक्स कहा जाता है। इसमें वोकल कॉर्ड्स होते हैं, जो हवा के कंपन से ध्वनि उत्पन्न करते हैं।
श्वासनली में C-आकार के कार्टिलेज के अधूरे छल्ले होते हैं। ये छल्ले हवा न होने पर भी श्वासनली को पिचकने या बंद होने से बचाते हैं।
फेफड़ों की सुरक्षा के लिए उनके चारों ओर दोहरी परत वाली प्लूरा झिल्ली (Pleural membrane) होती है, जिसके बीच में प्लूरल द्रव भरा होता है जो घर्षण कम करता है।
माइटोकॉन्ड्रिया को कोशिका का 'पावरहाउस' कहा जाता है क्योंकि यहीं पर ऑक्सीजन की उपस्थिति में भोजन का ऑक्सीकरण होता है और ऊर्जा एटीपी ($ATP$) के रूप में संचित होती है।
सांस छोड़ते समय डायाफ्राम शिथिल (relax) होकर वापस अपने सामान्य गुंबद के आकार में आ जाता है, जिससे छाती का आयतन कम होता है और हवा बाहर निकल जाती है।
लाल रक्त कोशिकाओं (RBC) में पाया जाने वाला हीमोग्लोबिन प्रोटीन ऑक्सीजन के साथ जुड़कर 'ऑक्सीहीमोग्लोबिन' बनाता है और इसे पूरे शरीर की कोशिकाओं तक पहुंचाता है।
मस्तिष्क स्तंभ में स्थित मेडुला ऑब्लोंगाटा शरीर की अनैच्छिक क्रियाओं जैसे श्वसन दर, हृदय की धड़कन और रक्तचाप को नियंत्रित करता है।
अत्यधिक व्यायाम या भारी काम करते समय जब मांसपेशियों को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती, तो ग्लूकोज का अधूरा टूटना होता है जिससे लैक्टिक अम्ल बनता है और मांसपेशियों में दर्द या ऐंठन होती है।
एक आराम की स्थिति में बैठा वयस्क व्यक्ति एक मिनट में औसतन 12 से 16 बार सांस लेता और छोड़ता है। (नोट: हृदय की धड़कन 72 बार प्रति मिनट होती है, श्वसन दर नहीं)।
स्पायरोमीटर एक चिकित्सा उपकरण है जो फेफड़ों में हवा की मात्रा (Volume) और सांस लेने की गति को मापता है, जिससे फेफड़ों की कार्यक्षमता का पता चलता है।
ग्लाइकोलाइसिस श्वसन का पहला चरण है जिसमें ग्लूकोज का एक अणु पाइरुविक अम्ल में टूटता है। यह प्रक्रिया ऑक्सीजन की उपस्थिति या अनुपस्थिति दोनों में कोशिका द्रव्य (Cytoplasm) में ही होती है।
जब डायाफ्राम और पसलियों की मांसपेशियां सिकुड़ती हैं, तो छाती की गुहा का आयतन बढ़ जाता है। आयतन बढ़ने से फेफड़ों के अंदर हवा का दबाव बाहर के वायुमंडलीय दबाव से कम (नकारात्मक) हो जाता है, जिससे हवा बाहर से खींचकर फेफड़ों में आ जाती है।
शरीर में बनने वाली लगभग 70% कार्बन डाइऑक्साइड का परिवहन रक्त प्लाज्मा में बाइकार्बोनेट आयनों (HCO3) के रूप में होता है। लगभग 20-25% हीमोग्लोबिन के साथ और 7% प्लाज्मा में घुलकर जाती है।
कूपिकाओं की दीवारें बेहद पतली, एक कोशिकीय परत वाली सरल शल्की उपकला (Simple squamous epithelium) की बनी होती हैं। यह पतली संरचना ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड के तेजी से विसरण (Diffusion) में मदद करती है।
रक्त में CO_2 बढ़ने या pH घटने पर मस्तिष्क का श्वसन केंद्र (Medulla) सक्रिय हो जाता है। शरीर से अतिरिक्त CO_2 को बाहर निकालने के लिए मस्तिष्क श्वसन दर और गहराई को बढ़ा देता है।
एक सामान्य स्वस्थ मनुष्य बिना अतिरिक्त प्रयास के शांत स्थिति में जितनी हवा अंदर लेता है या बाहर छोड़ता है, उसे ज्वारीय आयतन (Tidal Volume) कहते हैं। यह औसतन 500 mL होता है।
हम कितनी भी ताकत से सांस बाहर छोड़ दें, फेफड़े कभी पूरी तरह खाली नहीं होते। फेफड़ों में हमेशा लगभग 1100 mL से 1200 mL हवा बची रहती है जिसे अवशिष्ट आयतन (Residual Volume) कहते हैं। यह फेफड़ों को पिचकने से बचाती है।
कार्बन मोनोऑक्साइड की हीमोग्लोबिन के साथ जुड़ने की क्षमता (Affinity) ऑक्सीजन की तुलना में लगभग 200 से 250 गुना अधिक होती है। यह हीमोग्लोबिन के साथ मिलकर 'कार्बोक्सीहीमोग्लोबिन' बना लेती है, जिससे अंगों तक ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती और व्यक्ति की दम घुटने से मृत्यु हो सकती है।
एम्फिसिमा एक दीर्घकालिक (Chronic) फेफड़ों की बीमारी है जो मुख्य रूप से सिगरेट के धुएं के कारण होती है। इसमें कूपिकाएं आपस में टूट जाती हैं, जिससे फेफड़ों की गैस विनिमय करने की क्षमता बहुत कम हो जाती है।
ग्लाइकोलाइसिस के बाद, ऑक्सीजन की उपस्थिति में वायवीय श्वसन (Aerobic Respiration) का अगला मुख्य चरण 'क्रेब्स चक्र' होता है। यह पूरी प्रक्रिया माइटोकॉन्ड्रिया के मैट्रिक्स (भीतरी तरल भाग) में संपन्न होती है।
कूपिकाओं (Alveoli) की अंदरूनी सतह पर कोशिकाओं द्वारा एक लिपिड-प्रोटीन का मिश्रण स्रावित होता है जिसे सर्फेक्टेंट कहते हैं। यह कूपिकाओं के सतही तनाव को कम करता है, जिससे सांस छोड़ते समय वे आपस में चिपकती या पिचकती (Collapse) नहीं हैं।
श्वसन के दौरान बाहर निकलने वाली CO2 के आयतन और उपयोग में आने वाली O2 के आयतन के अनुपात को श्वसन गुणांक (RQ = CO2 / O2) कहा जाता है। कार्बोहाइड्रेट के लिए इसका मान हमेशा 1 होता है।